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कोरोना काल में ध्यान अन्दरूनी शक्तियों को बढाता है

सहारनपुर (लोकसत्य)। प्रकृति हमे जीना सिखाती है क्योंकि मानव शरीर ‌पंच तत्वों से ही बना है। यदि हम आकाश, वायु, अग्नि, जल व पृथ्वी से दूर रहेगे तो स्वास्थ्य में उन्नति नही हो सकती। योग गुरु गुलशन कुमार ने आज कहा कि हमारे शरीर में अपनी सेल्फ हीलिंग व चिकित्सा की व्यवस्था है। बचपन में जब चोट लगती है , तो बिना मरहम पट्टी के ठीक हो जाती है क्योंकि प्रकृति स्वयं चिकित्सक है। हड्डी का फ्रैक्चर होने पर उसके जुडने की प्रक्रिया प्रकृति द्वारा ही होती है। डाक्टर हड्डी के दो सिरो को मिलाने का कार्य करते है। हड्डी जुडने का कार्य प्रकृति करती है।

यह एक अवसर है जब भारत आयुर्वेद, प्राकृतिक चिकित्सा, योग जैसी प्राण देने वाली विधा के द्वारा कोरोना पर विजय पाकर समूचे विश्व को संदेश दे सकता है कि वैश्विक संकट काल में भारत की प्राचीन चिकित्सा पद्धतियां ही विश्व में सर्वश्रेष्ठ हैं।

प्रकृति ही शरीर पर प्रतिक्षण अरबों खरबों विषाणुओं के आक्रमण होने पर कार्य करते हुए हमे रोग मुक्त बनाने में लगी रहती है। प्रत्येक प्राणी व यह दिव्य जीवन शक्ति प्रकृति ने कूट कूट कर भरी है। इसी को प्रतिरोधक शक्ति या इम्यूनिटी कहा गया है।

इस कोरोना काल में मनुष्य प्रकृति से दूर हो गया। मुँह पर मास्क लगा देने से शरीर में आक्सीजन का स्तर कम हो रहा है फेफड़ों में कार्बन डाइऑक्साइड का स्तर बढ रहा है। इससे फेफड़ों की कार्य क्षमता कम होने से दमा व सांस के रोग बढेगे। मनुष्य उस प्रकृति से जो जीवन रक्षक है, वायु से दूर हो रहा है। वायु जो प्राण रक्षक है, जिससे शरीर के भीतर के आर्गेन को कोशिकाओं को जीवित रखने का सामर्थ्य है। हमारे अरबों सेल्स को प्रत्येक क्षण आक्सीजन चाहिए। मुँह व नासिका पर मास्क लगा देने से पर्याप्त आक्सीजन शरीर में नही पहुँच पा रहा है। व्यक्ति कोरोना के डर से मास्क नही लगाता बल्कि चालान के डर से मास्क लगा रहा है।

शरीर को जीवित रखने के लिए आक्सीजन चाहिए। आक्सीजन शरीर के सिस्टम को ठीक रखती है। कोरोना का खौफ व डर पैदा कर मास्क मुँह पर लगवा दिया गया । ऐसे लगातार कई दिन मास्क लगा देने से भीतर कोशिकाओं को प्राण आक्सीजन नही मिलने से वह कोशिकाएं मृत हो जाने से मनुष्य की स्वयं की शक्ति घटने लगेगी इम्यूनिटी घटने लगेगी व्यक्ति बीमार पडने लगेगा।

शरीर को सूर्य स्नान चाहिए ,धूप चाहिए , खुला आकाश चाहिए जहाँ स्वच्छंद भ्रमण किया जा सके । स्वच्छ जल चाहिए जिसका सेवन कर स्वयं के शरीर को डिटाक्सिफाई कर सके। प्राकृतिक आहार चाहिए, सकारात्मक उर्जा वाले संत चाहिए जिनका हम आशीर्वाद लेकर सकारात्मकता का अनुभव कर सके इन सभी से हमारी इम्यूनिटी बढती हैं। इसके विपरीत प्रकृति से मनुष्य को जोडने के बजाए कोरोना का डर दिखा कर दूर रखा जा रहा है। इससे नकारात्मकता का वातावरण बन गया है।

किसी भी विषाणु या बैक्टीरिया को मनुष्य को संक्रमित करने के लिए एक वातावरण चाहिए ताकि वह फैल सके यदि लो इम्यूनिटी , टाक्सिक शरीर , लो इम्यून सिस्टम, लो एनर्जी व डर व खौफ जैसा एन्वायरमेंट है तभी शरीर संक्रमित होता है।

कोरोना काल में ध्यान हमारी अन्दरूनी शक्तियों को बढाता है, भीतर के डर को मिटाता है। योग प्राणायाम से भीतर के प्राण कोष को विकसित कराने के कार्य को किया जाना चाहिए था । सात्विक व प्राकृतिक आहार लेने के लिए प्रेरित किया जा सकता था जिससे हमारी रोग प्रतिरोधक शक्ति बढ सकती थी। लेकिन उसके लिए कोई भी कार्य नही हुआ है।

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