सुप्रीम कोर्ट ने ऑनलाइन प्लेटफॉर्म्स पर बढ़ती अशोभनीय सामग्री को लेकर बड़ा संकेत दिया है। कोर्ट ने कहा कि डिजिटल कंटेंट को नियंत्रित करने के लिए अब एक स्वतंत्र और ऑटोनोमस बॉडी की जरूरत है। चीफ जस्टिस सूर्यकांत ने सुनवाई के दौरान कहा कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता एक अमूल्य अधिकार है, लेकिन यह किसी तरह की विकृति का कारण नहीं बन सकती। उन्होंने कहा कि अगर किसी कार्यक्रम में एडल्ट कंटेंट है, तो पहले से चेतावनी देना जरूरी होना चाहिए। कोर्ट पॉडकास्टर रणवीर अल्लाहबादिया और दूसरों पर दर्ज एफआईआरों से जुड़ी याचिकाओं पर सुनवाई कर रही थी और इसी दौरान ऑनलाइन कंटेंट रेग्युलेशन का मुद्दा व्यापक रूप से उठाया गया।
नए नियमों का मसौदा तैयार
सुनवाई के दौरान अटॉर्नी जनरल आर. वेंकटरमणी और सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने अदालत को बताया कि केंद्र सरकार ने नए नियमों का मसौदा तैयार किया है और विभिन्न हितधारकों से परामर्श जारी है। सॉलिसिटर जनरल मेहता ने कहा कि मामला सिर्फ अश्लीलता का नहीं है, बल्कि हर तरह के यूजर-जनरेटेड कंटेंट पर जवाबदेही तय होनी चाहिए। इस पर CJI ने सवाल उठाया कि कोई भी व्यक्ति अपना चैनल बनाकर कुछ भी अपलोड करे और किसी के प्रति जवाबदेह न हो ये कैसे स्वीकार किया जा सकता है? कोर्ट ने साफ कहा कि किसी न किसी स्तर पर जवाबदेही तय होना ही चाहिए।
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जस्टिस गीता मित्तल के नेतृत्व में समिति
सुनवाई में OTT प्लेटफॉर्म्स की ओर से सीनियर एडवोकेट अमित सिब्बल ने कहा कि 2021 के आईटी नियम पहले से मौजूद हैं और OTT प्लेटफॉर्म स्वेच्छा से कई प्रावधानों का पालन कर रहे हैं, जैसे कंटेंट कैटेगरी और आयु-आधारित वर्गीकरण। उन्होंने बताया कि शिकायतों के निपटारे के लिए जस्टिस गीता मित्तल के नेतृत्व में समिति भी काम कर रही है। लेकिन CJI ने सेल्फ-रेग्युलेशन को नाकाफी बताते हुए कहा कि अगर यह प्रणाली प्रभावी होती, तो उल्लंघन इतने बढ़ क्यों रहे हैं? कोर्ट ने कहा कि एक ऐसी संस्था चाहिए जो पूरी तरह निष्पक्ष हो और कंटेंट क्रिएटर्स व सरकार दोनों के प्रभाव से मुक्त हो।
समाज पर पड़ने वाले प्रभाव पर चिंता
सुप्रीम कोर्ट ने ऑनलाइन कंटेंट के समाज पर पड़ने वाले प्रभाव पर चिंता जताई, खासकर कमजोर वर्ग के लोगों पर। कोर्ट ने कहा कि केवल चेतावनियों या डिस्क्लेमरों से काम नहीं चलेगा, बल्कि उम्र सत्यापन प्रणाली जैसे मजबूत उपाय जरूरी हैं। सॉलिसिटर जनरल ने बताया कि संबंधित शो में कुछ बातें इतनी गंभीर थीं कि उन्हें अदालत में दोहराना भी मुश्किल है। कोर्ट ने सुझाव दिया कि सरकार ड्राफ्ट गाइडलाइंस प्रकाशित करे और जनसाधारण से सुझाव मांगे। इसके बाद विशेषज्ञों और न्यायिक पृष्ठभूमि वाले लोगों की एक समिति बनाकर अंतिम रूप दिया जाए। अदालत अब इस मामले की अगली सुनवाई चार सप्ताह बाद करेगी।