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क्या है तुलसी और भागवान शालिगराम के विवाह की विधि तथा लाभ…

नई दिल्ली (लोकसत्य)।हिन्दू धर्म में तुलसी एंव भगवान शालिगराम के विवाह का बड़ा महत्व है।तुलसी विवाह इस वर्ष 8 नवंबर शुक्रवार को है। कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी को तुलसी और भगवान शालिग्राम का विधिपूर्वक विवाह कराया जाता है। इस दिन ही चतुर्मास का समापन होता है और सभी देवता योग निद्रा से बाहर आते हैं। इसके फलस्वरूप मांगलिक कार्यों जैसे विवाह, उपनयन संस्कार, मुंडन आदि के लिए शुभ मुहूर्त प्राप्त होते हैं। आइए जानते हैं कि इस दिन तुलसी पूजा और तुलसी विवाह की विधि क्या है। 

तुलसी पूजा और विवाह

देवउठनी एकादशी को तुलसी के पौधे वाले गमले को गेरु रंग से सजाया जाता है। फिर उसके चारों और गन्ने का मंडप बनाया जाता है और उस पर सुहाग का प्रतीक लाल ओढ़नी ओढ़ाई जाती है। इसके पश्चात उस गमले में साड़ी लपेट देते हैं और तुलसी को चूड़ी अर्पित करते हैं। इस प्रकार से तुलसी का विधिवत श्रृंगार किया जाता है।

तुलसी का श्रृंगार करने के बाद श्रीगणेश जी, भगवान श्रीकृष्ण और शालिग्राम जी का विधि विधान से पूजा की जाती है। फिर तुलसी माता का तुलस्यै नमः मंत्र से षोडशोपचार पूजन किया जाता है।     

इसके बाद एक सूखे नारियल को कुछ ​दक्षिणा के साथ रखें। फिर भगवान शालिग्राम की मूर्ति को लेकर तुलसी माता की ठीक वैसे ही परिक्रमा कराएं जैसे कि विवाह में फेरे के वक्त होता है। इसके पश्चात आरती से विवाह का कार्य पूर्ण करें। इस पूरी विधि में विवाह में गाए जाने वाले मंगल गीत भी गा सकते हैं।

तुलसी विवाह का लाभ

यदि किसी ​विवाहित जोड़े के रिश्ते में कोई समस्या आ रही है तो उन लोगों को तुलसी विवाह का आयोजन करना चाहिए। ऐसा करने से उनके दाम्पत्य जीवन में आ रही समस्याओं का निदान हो जाता है। जो लोग शादी के लिए रिश्ते देख रहे होते हैं, उनकी बात पक्की होने की संभावना बढ़ जाती है। 

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