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जानें हिंदू धर्म में स्वस्तिक का क्या है महत्व

नई दिल्ली (लोकसत्य)। हिंदू धर्म में बहुत सी ऐसी मान्यताएं हैं जिन्हे हर कोई निभाता है हमारे यहां चिन्हों और प्रतीकों का बहुत महत्व है। उनमे से एक है हर शुभ काम में स्वस्तिक चिन्ह का होना। मंगल कार्यों के लिए स्वास्तिक बनाने का भी विशेष महत्व दिया गया है। स्वस्तिक को ‘साथिया’ या ‘सातिया’ भी कहा जाता है। वैदिक ऋषियों ने अपने आध्यात्मिक अनुभवों के आधार पर कुछ विशेष चिह्नों की रचना की। मंगल भावों को प्रकट करने वाले और जीवन में खुशियां भरने वाले इन चिह्नों में से एक है स्वस्तिक। ऐसे में क्या आप जानते हैं कि स्वास्तिक का अर्थ और इसका महत्व क्या है? आइए, जानते हैं-

स्वस्तिक का अर्थ
स्वास्तिक शब्द मूलभूत ‘सु+अस’ धातु से बना है। ‘सु’ का अर्थ कल्याणकारी एवं मंगलमय है,’ अस ‘का अर्थ है अस्तित्व एवं सत्ता। इसीलिए स्वास्तिक का अर्थ हुआ ऐसा अस्तित्व, जो शुभ भावना से भरा और सभी के लिए कल्याणकारी हो। जहाँ कोई अशुद्धता ,नकरात्मक ऊर्जा का वास न हो, अशुभता, अमंगल एवं अनिष्ट का डर न हो । तथा जहाँ केवल कल्याण एवं मंगल की भावना ही निहित हो और सभी के लिए शुभ भावना सन्निहित हो सकरात्मक ऊर्जा का वास हो इसलिए स्वास्तिक को कल्याण की सत्ता और उसके प्रतीक के रूप में निरूपित किया जाता है।

स्वास्तिक की हर रेखा का है विशेष महत्व
स्वस्तिक के पीछे ढेरों तथ्य हैं जो इसकी विषेशता समझाते है । स्वास्तिक में चार प्रकार की रेखाएं होती हैं, जिनका आकार एक समान होता है।यह रेखाएं चार दिशाओं- पूर्व, पश्चिम, उत्तर एवं दक्षिण की ओर इशारा करती हैं। लेकिन हिन्दू मान्यताओं के अनुसार यह रेखाएं चार वेदों – ऋग्वेद, यजुर्वेद, अथर्ववेद और सामवेद का प्रतीक हैं। मान्यता यह भयउ है की ये चार रेखाएं सृष्टि के रचनाकार भगवान ब्रह्मा के चार सिरों को दर्शाती हैं। इसके अलावा इन चार रेखाओं की चार पुरुषार्थ, चार आश्रम, चार लोक और चार देवों यानी कि भगवान ब्रह्मा, विष्णु, महेश और गणेश से तुलना की गई है।

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