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कैंसर का मुख्य कारण तंबाकू सेवन है: सिंघल

जयपुर(लोकसत्य)। वैश्विक महामारी कोरोना काल में कैंसर रोग विशेषज्ञों ने तंबाकू सेवन से होने वाले कैंसर से युवा पीढ़ी को बचाने के लिए सभी को जागरुक होने की जरुरत बताते हुए आशंका जताई हैं कि इस और कोई कदम नहीं उठाया गया तो कैंसर में धुंआ रहित तंबाकू से अस्सी प्रतिशत मौतें विकासशील देशों में होगी।

सवाई मान सिंह चिकित्सालय जयपुर के कान नाक गला विभाग आचार्य एवं कैंसर विशेषज्ञ डॉ.पवन सिंघल ने विश्व सिर एवं गला कैंसर दिवस के अवसर पर यह आशंका जताते हुए कहा कि इन 80 प्रतिशत मौतों को रोका जा सकता है, इसके लिए सभी को जागरुक होना पड़ेगा। तभी हम युवा पीढ़ी को बचा पाएंगे। इस पर यदि कोई हस्तक्षेप नहीं हुआ तो इन मौतों में 80 प्रतिशत मौतें विकासशील देशों में होगी।

उन्होंने इस अवसर पर लोगों से धुआरहित तंबाकू से दूर रहने की अपील करते हुए कहा कि कैंसर का मुख्य कारण तंबाकू सेवन है। उन्होंने बताया कि बदलती जीवनशैली के साथ बीमारियां भी बढ़ती जा रही है और धुंआ रहित तंबाकू के सेवन करने से अस्सी प्रतिशत मुंह, गले और सिर का कैंसर होता है। इसमें युवा अवस्था में होने वाली मौतों का मुख्य कारण भी मुंह एवं गले का कैंसर है।

कैंसर विशेषज्ञ डॉ सिंघल ने बताया कि इस समय जो लेाग अस्पताल की ओपीडी में आ रहे है उनमें अधिक संख्या युवाओं की है। करीब 30 साल पहले तक 60 से 70 साल की उम्र में मुंह और गले का कैंसर होता था लेकिन अब यह उम्र कम होकर 20 से 45 साल तक पहुंच गई। वही आजकल 20 से 25 वर्ष के कम उम्र के युवाओं में मुंह एवं गले का कैंसर देखा जा रहा है। धुुंआरहित तंबाकू के सेवन से 80 प्रतिशत तक हैड नेक कैंसर होता है,जबकि इससे 50 प्रतिशत तक सभी तरह का कैंसर भी पूरे शरीर में होता है। जिसमें मुंह, होठों, जीभ, गाल, दांत, तालू, गले, भोजन नली, पेट आदि अंगों मेें होने वाला कैंसर शामिल है।

उन्होने बताया कि इस तरह के उत्पदों का सेवन करने से हार्ट अटैक, ब्रेन स्ट्रोक का खतरा भी बढ़ता है। सिर एवं गले का कैंसर महिलाओं की अपेक्षा पुरुषों में तीन से चार गुणा तक अधिक हेाता है। इसका सबसे बड़ा कारण युवाओं में धुम्रपान को फैशन एवं स्टाइल आइकान मानना है। मुंह के कैंसर के रोगियों की सर्वाधिक संख्या भारत में है, इसीलिए भारत को ओरल कैंसर की केपिटल कहा जाता है। खराब लाइफस्टाइल एवं कम जागरूकता के आभाव में देश में तेजी से कैंसर रोगियों की संख्या बढ़ी है। कैंसर के उपचार में नई क्रांति हुई है लेकिन इलाज महंगा है। समय रहते अगर इसकी पहचान की जाए तो इलाज संभव है।

राजस्थान में चबाने वाले तंबाकू उत्पादों का उपयेाग अधिक हेाता है, खासतौर पर बीकानेर, जोधपुर, बाड़मेर और श्रीगंगानगर आदि जिलों में कैंसर तथा अन्य घातक बीमारियों से ग्रसित रोगियों की संख्या सर्वाधिक है। इसके अलावा हनुमानगढ़, चूरू, झुंझनूं, फलौदी, जैसलमेर, धौलपुर, भरतपुर, पोकरण, बालोतरा, टोंक, सवाईमाधोपुर, बहरोड़, पाली आदि क्षेत्र में भी ओरल कैंसर रोगियों की संख्या में तेजी से बढ़ोतरी हो रही है।

डॉ. पवन सिंघल ने बताया कि बढ़ते हैड नेक कैंसर रोग की रोकथाम के लिए ओरल कैंसर की नियमित स्क्रीनिंग, आम लेागों को इसके प्रति जागरुक करना जरुरी है। इसके अभाव में कैंसर रोग की देरी से पहचान, अपर्याप्त इलाज एवं अनुपयुक्त पुनर्वास सहित सुविधाओं का अभाव है। धूम्ररहित तंबाकू के उपयोग करने वालों का शुरुआती सफर उन्हें आनंदित करता है लेकिन समय के साथ इसका सेवन कष्टदायी बन जाता है। धूम्ररहित तंबाकू के उपयोगकर्ता धूम्रपान रहित उत्पादों के सरोगेट विज्ञापन के कारण छोड़ने की योजना बनाने वालों की संख्या कम है।

पान मसाला के विज्ञापनों पर रोक लगे होने के बावजूद टीवी चैनलों, रेडियो, समाचार पत्रों पर प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से विज्ञापन दिखाए जा रहे हैं। विशेष रूप से बच्चे और युवा वर्ग इन विज्ञापनों का आसानी से शिकार हो जाते हैं और विज्ञापनों के लालच में इन उत्पादों को खरीदते भी हैं। पान मसाला और सुगंधित माउथ फ्रेशनर्स के लोकप्रिय ब्रांडों में सुपारी का उपयोग किया जाता है, जिसे केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय ने कैंसर का कारण के रूप में पुष्टि की है।

उन्होंने कहा कि कैंसर को रोकने के लिए सरकारों को धूम्ररहित तंबाकू के प्रचलन पर अधिक निवारक रणनीति बनानी चाहिए। उन्होंने कहा कि चिकित्सकों को भी चिकित्सक के रूप में यह सुनिश्चित करना चाहिए कि कोई भी मरीज ओपीडी से तंबाकू का सेवन छोड़ने की सलाह के बिना नहीं जाए, चाहे वह धूम्र रहित तंबाकू का सेवन करता है या फिर वह धूम्रपान करता हो।

उन्होंने बताया कि ग्लोबल एडल्ट टोबैको सर्वे (जीएटीएस) 2017 की रिपोर्ट के अनुसार स्वास्थ्य सेवा प्रदाताओं ने 48.8 पतिशत लोगों को धूम्रपान छोड़ने की सलाह दी है। इसकी तुलना में केवल 31.7 प्रतिशत लोगों को तंबाकू सेवन न करने की सलाह दी गई है। दोनों के बीच 17.1 प्रतिशत का अंतर है। इस दौरान देखा गया है कि भले ही समस्या धूम्रपान रहित या चबाने वाली तम्बाकू के कारण हो, लेकिन धूम्र रहित तंबाकू के सेवन पर ध्यान केंद्रित करने की बजाय पर अधिक ध्यान धूम्रपान पर दिया जाता है। गैर-संचारी रोग (एनसीडी) के खिलाफ अभियान चलाने वाली राज्य सरकारों के स्वास्थ्य सेवा प्रदाताओं को सभी तरह के तंबाकू उपयोगकर्ताओं को तंबाकू छोड़ने की सलाह देनी चाहिए।

सुखम फाउंडेशन के ट्रस्टी गुरजंट धालीवाल का कहना है कि हर तीसरा वयस्क भारतीय एक गंभीर बीमारी से जूझ रहा है। तंबाकू अकेला ऐसा वैध उत्पाद है जिसे यदि इसके विनिर्माता की सिफारिश के मुताबिक इस्तेमाल किया जाए तो आधे उपयोगकर्ता की मौत हो जाती है। जीवन के लिए संकल्प- तंबाकू मुक्त युवा जैसे अभियानों में शुरुआत में ही इसे रोकने पर ध्यान केंद्रित किया जाता है और जहां तंबाकू सेवन त्यागने वाले इस देश के लिए रोल मॉडल के तौर पर व्यापक प्रभाव डालते हैं। इसे जन स्वास्थ्य के कई अन्य कारणों के लिए दोहराया जा सकता है। जहां उद्योग युवाओं को आकर्षित करने पर ध्यान देता है, सार्वजनिक स्वास्थ्य कार्यक्रमों में इसकी रोकथाम पर काम होना चाहिए। हमारे युवाओं की रक्षा के लिए यही एकमात्र उपाय है।

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